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विकासखंड - नैनपुर, ज़िला - मंडला (मध्य प्रदेश)

शनिवार, 12 सितंबर 2020

DNA क्या है और कैसे काम करता है

 

विज्ञान में लगभग 1200 प्रकार के DNA टेस्ट मौजूद है, के बारे ने जानेंगे जिनमे अनुवांशिक संबंधों को पता लगाया जाता है। अर्थात माता-पिता, दादा-दादी, खानदान वंश परिवार या जातीय समूह का पता लगाना। इसका उद्देश्य उत्तराधिकार या सम्पत्ति के विवादो को या दूसरी तरह की भावनात्मक गुत्थियों को सुलझाना है। अब नवजात शिशु की भी DNA जांच होने लगी है। जिससे बच्चे के जीन्स के दोषों का पता लगाया जा सके। डीएनए की खोज अंग्रेजी वैज्ञानिक जेम्स वॉटसन और फ्रांसिस क्रिक के द्वारा वर्ष 1953 में की गई थी। इस खोज के लिए उन्हें सन 1962 में नॉबेल पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था। DNA जीवित कोशिकाओं की गुणसूत्र में लाये जाने वाले तंतुनुमा अणु को DNA कहते है।
इसमे अनुवांशिक गुण जुड़े रहते है। DNA अणु की सरंचना घुमावदार सीढ़ी की तरह होती है। DNA का एक अणु चार अलग-अलग रासायनिक वस्तुओ Adenine, Thymine, Guanine,  Cytosine से बना है। जिन्हें न्यूक्लोटाइड् कहते है। ये एक नाइट्रोजन युक्त  वस्तु है। इन न्यूक्लोटाइडों से युक्त डीओक्सीराइबो नाम का एक शक्कर भी पाया जाता है। इन इन न्यूक्लोटाइडों को फास्फेट का अणु जोड़ता है। न्यूक्लोटाइडों के संबंध के अनुसार एक कोशिका के लिए जरूरी प्रोटीनों का निर्माण होता है। अतः DNA हर एक जीवित कोशिका के लिए अनिवार्य है। DNA आमतौर पर गुणसूत्र के रूप में होता है। एक कोशिका में गुणसूत्रों के Cell अपने जीनो यानि DNA में मौजूद जीन का अनुक्रम का निर्माण करता है। मानव जीनो 46 गुणसूत्रों की व्यवस्था में DNA के लगभग 3 अरब आधार जुड़े है। जीन आनुवंशिकता की मूलभूत इकाई है। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होती है। यानि इसी में हमारी अनुवांशिक विशेषताओं की जानकारी मिलती है। जिस हमारे बालो का रंग कैसा होगा , आंखों का रंग कैसा होगा या हमे कौन सी बीमारिया हो सकती है। ये जानकारियां माता-पिता से उनकी संतानों में DNA के माध्यम से स्थानांतरित होती है। इसलिए ये भी कहा जाता है कि इंसान का DNA अमर होता है। जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानांतरित होता रहता है। ये जानकारी कोशिकाओं के केंद्र में मौजूद जिस तत्व में रहती है उसे DNA कहते है। जब किसी जीन के DNA में कोई स्थायी परिवर्तन होता है उत्तपरिवर्तन कहा जाता है। ये कोशिकाओं में विभाजन के समय किसी दोष के कारण पैदा हो सकता है। या फिर पराबैंगनी विकिरण की बजह से या रासायनिक तत्व या वायरस से भी हो सकता है। DNA की Full form- Deoxiribo-nucleic Acid है।
ये जीवो की सभी कोशिकाओं में मौजूद होता है। DNA की मदद से किसी व्यक्ति कर बायोलॉजिकल माता या पिता गया सकते है। ज्यादातर मामलों में ये बच्चे के पिता का पता लगाने में इस्तेमाल होता है। कुछ केस जैसे एग डोनेशन या सही माँ का पता नही होने आदि में इसका इस्तेमाल करते है। DNA जीवो में पाया जाने वाला Genetic material है। इसकी सरंचना डबल हेलिकल होती है। GC और AT base के बीच हाइड्रोजन बांड से ये दो हेलिक्स को जोड़ते है। ये प्राणियों में अनुवांशिक या जेनेटिक पदार्थ का काम करता है। जिसमे जीवित चीजो के विकास और कार्यो के लिए अनुवांशिक निर्देश होते है। अनुवांशिक जानकारी DNA ने न्यूक्लोटाइड्स के रैखिक अनुक्रम में की जाती है। DNA को एक ब्लूप्रिंट की तरह समझा जा सकता है। DNA निर्धारित करता है कि व्यक्ति कैसा दिखेगा ओर शरीर कैसे काम करेगा। यह शरीर की सभी कोशिकाओं में मौजूद रहता है। और इसमे बुनियाद अनुवांशिक जानकारी है। DNA शरीर मे हर घटक की सरंचना और कार्य को नियंत्रित करता है। सभी मे डीएनए पैटर्न अलग होता है सिवाय अनुवांशिक रूप से समान जुड़वा को छोड़कर आधा DNA जैविक माँ से मिलता है तथा आधा पिता से मिलता है।

DNA की सरंचना और महत्व:-

DNA मानव में और लगभग अन्य सभी जीव में अनुवांशिक सामग्री है। किसी मानव के शरीर मे लगभग हर कोशिका में एक ही DNA होता है। ज्यादातर DNA , cell नाभिक में स्थित है । डीओक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड एक अणु है जो कि सभी ज्ञात जीवो के विकास और प्रजनन में प्रयुक्त अनुवांशिक निर्देशो और कई वायरस DNA और RNA न्यूक्लिक एसिड है। प्रोटीन लिपिड और जटिल कार्बोहाइड्रेट पॉलीसेकेराइट के साथ उन चार प्रकार के अणुओ में से एक है जो जीवन के सभी ज्ञातरूपो के लिए आवश्यक है।

DNA कैसे काम करता है:-

DNA आपके शरीर के हर कोशिका की अनुवांशिक संदेशो को स्थानांतरित करने के लिए एल आदर्श अणु है। जब एक अंडे और शुक्राणु आपसे पहले cell बनने के लिए मिले तो आपको पूरा अनुवांशिक गुण दिया गया था। जो कि आपकी सभी कोशिका तथा आपके जीवन के बाकी हिस्सों के लिए उपयोग करेगी। उस पहले cell में गुणसूत्रों  का आधा यानी डीएनए का आधा भाग माँ से आया था तथा आधा भाग पिता से आया था। ये पहली कोशिकांग दो कोशिकाओं के बनने के बनने के लिए विभाजित होती है। उदाहरण के लिए नई त्वचा  या रक्त कोशिकाओं के निर्माण अधिकांश समय कोशिकाये पूरी तरह विभाजित करती है। और DNA अणुओ में प्रत्येक को प्रतिलिपि बना दिया जाता है। एक प्रति नई कोशिकाओं में जाने के लिए यदि गलतियां की जाती है। तो वे नष्ठ हो जाती है अतः उनका विनाश हो जाता है।

DNA कैसा दिखता है:-

DNA मुख्य रूप से घुमावदार सीढ़ी जैसा दिखता है। इस आकार को डबल हेलिक्स कहा जाता है। सीढ़ी के किनारे शर्करा ओर फॉस्फेट अणुओ की एक बारीकी से जुड़ी एक श्रृंखला है। पायदान चीनी अणुओ से जुड़ता है। और इसे कुर्सिया कहा जाता है। इसमे चार बेस Adenine, Thymine, Guanine, Cytosine है। प्रत्येक पायदान दो आधारों से बना होता है जो एकसाथ लिंक करते है।


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केप्लर के ग्रहीय गति संबंधी नियम



1.केप्लर का प्रथम नियम(Law Of Orbit):-

केप्लर के प्रथम नियम के अनुसार प्रत्येक ग्रह सूर्य के चारो ओर दीर्घवृत्ताकार कक्षा में गति करता है। तथा सूर्य ग्रह के एक फोकस या नाभि बिन्दु पर स्थित होता है।


2.केप्लर का दूसरा नियम(Law Of Areas):-

● प्रत्येक ग्रह का क्षेत्रीय वेग नियत रहता है। इसका प्रभाव यह पड़ता है कि जब ग्रह सूर्य के निकट आता है तो उसका वेग बढ़ जाता है तथा जब ग्रह सूर्य से दूर जाता है तो उसका वेग कम हो जाता है।
● वह स्थान जहाँ से ग्रह सूर्य के सबसे नजदीक होता है उपसौर कहलाता है। तथा वह स्थान जहाँ से ग्रह सूर्य से सबसे दूर होता है अपसोर कहलता है।
● केप्लर के दूसरे नियम के अनुसार सूर्य तथा ग्रहों को जोड़ने वाली रेखा समान समयांतराल में समान क्षेत्रफल तय करती है।


3.केप्लर का तीसरा नियम(Law Of Period):-

ग्रह सूर्य के चारो ओर जितने समय मे एक चक्कर लगाता है उस समय को ग्रह का परिक्रमण (T) काल कहते है। परिक्रमण काल का वर्ग (T^2) ग्रह की सूर्य से औसत दूरी के घन (a^3) के अनुक्रमनुपति होता है। इसका प्रभाव यह होता है कि सूर्य से अधिक दूर ग्रह का परिक्रमण काल भी अधिक होता है तथा सूर्य के पास के ग्रह का परिक्रमण काल कम होता है। जैसे- सूर्य के सबसे पास ग्रह बुध का परिक्रमण काल 88 दिन है तथा सूर्य से सबसे दूर ग्रह वरुण का परिक्रमण काल 165 वर्ष है।






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अर्थशास्त्र की प्रकृति एवं सिद्धांत

 



उपभोक्ता मांग सिद्धांत

उपभोक्ता मांग सिद्धांत उपभोग व्यय के लिए वस्तुओं और सेवाओं दोनों की खपत के लिए वरीयताओं से संबंधित है; अंत में, वरीयताओं और उपभोग व्यय के बीच इस संबंध का उपयोग उपभोक्ता मांग घटता को वरीयता देने के लिए किया जाता है। व्यक्तिगत प्राथमिकताओं, उपभोग और मांग वक्र के बीच की कड़ी अर्थशास्त्र में सबसे अधिक बारीकी से अध्ययन किए गए संबंधों में से एक है। यह विश्लेषण करने का एक तरीका है कि उपभोक्ता बजट की बाधाओं के बीच उपयोगिता को अधिकतम करके वरीयताओं और व्यय के बीच संतुलन कैसे प्राप्त कर सकते हैं।

उत्पादन सिद्धांत

उत्पादन सिद्धांत उत्पादन या इनपुट को आउटपुट में बदलने की आर्थिक प्रक्रिया का अध्ययन है। [५] उत्पादन एक अच्छी या सेवा बनाने के लिए संसाधनों का उपयोग करता है जो उपहार अर्थव्यवस्था में उपयोग, उपहार देने या बाजार अर्थव्यवस्था में विनिमय के लिए उपयुक्त है। इसमें विनिर्माण, भंडारण, शिपिंग और पैकेजिंग शामिल हो सकते हैं। कुछ अर्थशास्त्री बड़े पैमाने पर उत्पादन को खपत के अलावा सभी आर्थिक गतिविधियों के रूप में परिभाषित करते हैं। वे अंतिम व्यावसायिक खरीद के अलावा हर व्यावसायिक गतिविधि को किसी न किसी रूप में देखते हैं।

मूल्य का उत्पादन सिद्धांत

मूल्य के उत्पादन का सिद्धांत बताता है कि किसी वस्तु या स्थिति की कीमत का निर्धारण उस संसाधन की लागत के योग से होता है जो इसे बनाने में गया था। लागत में उत्पादन के किसी भी कारक (श्रम, पूंजी या भूमि सहित) और कराधान शामिल हो सकते हैं। प्रौद्योगिकी को निश्चित पूंजी के रूप में देखा जा सकता है (जैसे एक औद्योगिक संयंत्र) या परिसंचारी पूंजी (जैसे मध्यवर्ती माल)।

उत्पादन की लागत के लिए गणितीय मॉडल में, लघु-रन कुल लागत तय लागत और कुल परिवर्तनीय लागत के बराबर है। निश्चित लागत से तात्पर्य उस लागत से है, जो इस बात पर ध्यान दिए बिना होती है कि फर्म कितना उत्पादन करती है। परिवर्तनीय लागत किसी वस्तु के उत्पादन की मात्रा का एक कार्य है। मुख्य रूप से रोनाल्ड शेफर्ड (1953, 1970) और अन्य विद्वानों  द्वारा विकसित अर्थशास्त्र में द्वैत सिद्धांत के माध्यम से उत्पादन को चिह्नित करने के लिए लागत समारोह का उपयोग किया जा सकता है।



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व्यष्टि अर्थशास्त्र

 सूक्ष्मअर्थशास्त्र (ग्रीक उपसर्ग माइक्रो - अर्थ "छोटा" + "अर्थशास्त्र") अर्थशास्त्र की एक शाखा है जो यह अध्ययन करता है कि किस प्रकार अर्थव्यवस्था के व्यक्तिगत अवयव, परिवार एवं फर्म, विशिष्ट रूप से उन बाजारों में सीमित संसाधनों के आवंटन का निर्णय करते हैं, जहां वस्तुएं एवं सेवाएं खरीदी एवं बेचीं जाती हैं। सूक्ष्म अर्थशास्त्र यह परीक्षण करता है कि ये निर्णय एवं व्यवहार किस प्रकार वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति एवं मांगों को प्रभावित करते हैं, जो मूल्यों का निर्धारण करती हैं और किस प्रकार, इसके बदले में, मूल्य, वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति एवं मांगों को निर्धारित करती है।



वृहतअर्थशास्त्र में इसके विपरीत होता है, जिसमें वृद्धिमुद्रास्फीति, एवं बेरोजगारी से संबंधित क्रियाकलापों का कुल योग शामिल होता है। सूक्ष्मअर्थशास्त्र अर्थव्यवस्था के पूर्व में बताये गए पहलुओं पर राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों (जैसे कि कराधान के बदलते स्तरों) के प्रभावों की भी चर्चा करता है। विशेष रूप से लुकास की आलोचना के मद्देनजर, अधिकांश आधुनिक वृहत आर्थिक सिद्धांत का निर्माण 'सूक्ष्मआधारशिला' - अर्थात् सूक्ष्म-स्तर व्यवहार के संबंध में बुनियादी पूर्वधारणाओं के आधार पर किया गया है।

सूक्ष्मअर्थशास्त्र का एक लक्ष्य बाजार तंत्र का विश्लेषण करना है जो वस्तुओं एवं सेवाओं के बीच सापेक्ष मूल्य की स्थापना और कई वैकल्पिक उपयोगों के बीच सीमित संसाधनों का आवंटन करता है। सूक्ष्मअर्थशास्त्र बाजार की विफलता का विश्लेषण करता है, जहां बाजार प्रभावशाली परिणाम उत्पन्न करने में विफल रहते हैं और यह पूर्ण प्रतियोगिता के लिए आवश्यक सैद्धांतिक अवस्थाओं का वर्णन करता है। सूक्ष्मअर्थशास्त्र में अध्ययन के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सामान्य संतुलनअसममित जानकारी के अंतर्गत बाजार, अनिश्चितता के अंतर्गत विकल्प और खेल सिद्धांत के आर्थिक अनुप्रयोग शामिल हैं। बाजार व्यवस्था के भीतर उत्पादों के लोच पर भी विचार किया जाता है।



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अर्थशास्त्र (Economics):

 

  • अर्थशास्त्र (Economics) सामाजिक विज्ञान की वह शाखा है, जिसके अन्तर्गत वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन, वितरण, विनिमय और उपभोग का अध्ययन किया जाता है।
  • अर्थशास्त्र दो शब्दों से बना है, अर्थ और शास्त्र; इसलिए इसकी सबसे सरल परिभाषा यह है कि वह ऐसा शास्त्र है जिसमें मनुष्य के अर्थसंबंधी प्रयत्नों का विवेचन हो। किसी विषय के संबंध में मुनष्यों के कार्यो के क्रमबद्ध ज्ञान को उस विषय का शास्त्र कहते हैं, इसलिए अर्थशास्त्र में मुनष्यों के अर्थसंबंधी कायों का क्रमबद्ध ज्ञान होना आवश्यक है।
  • अर्थशास्त्र में अर्थसंबंधी बातों की प्रधानता होना स्वाभाविक है। परंतु हमको यह नहीं भूलना चाहिए कि ज्ञान का उद्देश्य अर्थ प्राप्त करना ही नहीं है, सत्य की खोज द्वारा विश्व के लिए कल्याण, सुख और शांति प्राप्त करना भी है।
  • अर्थशास्त्र यह भी बतलाता है कि मनुष्यों के आर्थिक प्रयत्नों द्वारा विश्व में सुख और शांति कैसे प्राप्त हो सकती है। सब शास्त्रों के समान अर्थशास्त्र का उद्देश्य भी विश्वकल्याण है। अर्थशास्त्र का दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय है, यद्यपि उसमें व्यक्तिगत और राष्ट्रीय हितों का भी विवेचन रहता है। यह संभव है कि इस शास्त्र का अध्ययन कर कुछ व्यक्ति या राष्ट्र धनवान हो जाएँ और अधिक धनवान होने की चिंता में दूसरे व्यक्ति या राष्ट्रों का शोषण करने लगें, जिससे विश्व की शांति भंग हो जाए। परंतु उनके शोषण संबंधी ये सब कार्य अर्थशास्त्र के अनुरूप या उचित नहीं कहे जा सकते, क्योंकि अर्थशास्त्र तो उन्हीं कार्यों का समर्थन कर सकता है, जिसके द्वारा विश्वकल्याण की वृद्धि हो।
  • इस विवेचन से स्पष्ट है कि अर्थशास्त्र की सरल परिभाषा इस प्रकार होनी चाहिए-अर्थशास्त्र में मुनष्यों के अर्थसंबंधी सब कार्यो का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है। उसका ध्येय विश्वकल्याण है और उसका दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय है

भारत में अर्थशास्त्र

 अर्थशास्त्र बहुत प्राचीन विद्या है। चार उपवेद अति प्राचीन काल में बनाए गए थे। इन चारों उपवेदों में अथर्ववेद भी एक उपवेद माना जाता है। परंतु अब यह उपलब्ध नहीं है। विष्णु पुराण में भारत की प्राचीन तथा प्रधान 18 विद्याओं में अर्थशास्त्र भी परिगणित है। इस समय बृहस्पति तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र ही उपलब्ध हैं। अर्थशास्त्र के सर्वप्रथम आचार्य बृहस्पति थे। उनका अर्थशास्त्र सूत्रों के रूप में प्राप्त है, परंतु उसमें अर्थशास्त्र संबंधी सब बातों का समावेश नहीं है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र ही एक ऐसा ग्रंथ है जो अर्थशास्त्र के विषय पर उपलब्ध क्रमबद्ध ग्रंथ है, इसलिए इसका महत्व सबसे अधिक है। आचार्य कौटिल्य चाणक्य के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। ये चंद्रगुप्त मौर्य (321-297 ई.पू.) के महामंत्री थे। इनका ग्रंथ 'अर्थशास्त्र' पंडितों की राय में प्राय: 2,300 वर्ष पुराना है। आचार्य कौटिल्य के मतानुसार अर्थशास्त्र का क्षेत्र पृथ्वी को प्राप्त करने और उसकी रक्षा करने के उपायों का विचार करना है। उन्होंने अपने अर्थशास्त्र में बह्मचर्य की दीक्षा से लेकर देशों की विजय करने की अनेक बातों का समावेश किया है। शहरों का बसाना, गुप्तचरों का प्रबंध, फ़ौज की रचना, न्यायालयों की स्थापना, विवाह संबंधी नियम, दायभाग, शुत्रओं पर चढ़ाई के तरीके, किलाबंदी, संधियों के भेद, व्यूहरचना इत्यादि बातों का विस्ताररूप से विचार आचार्य कौटिल्य अपने ग्रंथ में करते हैं। प्रमाणत: इस ग्रंथ की कितनी ही बातें अर्थशास्त्र के आधुनिक काल में निर्दिष्ट क्षेत्र से बाहर की हैं। उसमें राजनीति, दंडनीति, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र इत्यादि विषयों पर भी विचार हुआ है।

दैनिक जीवन में उपचयन अभिक्रियाओं का प्रभाव :

 (i) संक्षारण: जब कोई धातु, आद्रता, अम्ल आदि के संपर्क में आती है, जिससे धातु की ऊपरी पार्ट कमजोर हो | संक्षारित हो जाता है |

लोहे की वस्तुओं पर जंग लगना , ताम्बे के ऊपर हरी पर्त चढ़ना संक्षारण के उदाहरण है |

यशदलेपन, विधुत लेपन अऊर पेंट करके संक्षारण से धातुओं को बचाया जा सकता है |

(ii) विकृतगंधिता : वसायुक्त और तैलीय खाद्यसामग्री , वायु के संपर्क में आने पर उपचयित हो जाती है,जिससे उसके स्वाद और गंध में परिवर्तन हो जाता है , इसे विकृतगंधिता कहते हैं |

  • विकृतगंधिता रोकने के उपाय :
  1.  प्रति ऑक्सीकारक का उपयोग करके
  2. वायु के स्थान पर नाइट्रोजन गैस द्वारा
  3.  शीतलन द्वारा

रासायनिक अभिक्रियाएं एवं समीकरण:

 

ऐसे परिवर्तन जिसमें नए गुणों वाले पदार्थो का निर्माण होता है , उसे रासायनिक अभिक्रिया कहते हैं |

ऐसे पदार्थ जो किसी रासायनिक अभिक्रिया में हिस्सा लेते हैं उन्हें अभिकारक कहते हैं | ऐसे पदार्थ जिनका निर्माण रासायनिक अभिक्रिया में होता है , उन्हें उत्पाद कहते हैं |

उदाहरण :

  1.  भोजन  पाचन
  2. लोहे  पर जंग लगना
  3. दही का बनना

रासायनिक अभिक्रियाओं के प्रकार :

1. संयोजन अभिक्रिया : इस अभिक्रिया में दो या दो से अधिक अभिकारक मिलकर एक उत्पाद बनाते हैं |

उदाहरण :  1.  कोयले का दहन     2. जल का निर्माण

  • ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया :  जिन अभिक्रियाओं में उत्पाद के निर्माण के साथ साथ ऊष्मा का बभी उत्सर्जन होता है
    उदाहरण : प्राकृतिक गैस का दहन2.  वियोजन अभिक्रिया: इस अभिक्रिया में एकल अभिकारक टूट क्र दो या या उससे अधिक उत्पाद बनाते हैं |

(i) उष्मीय वियोजन : ऊष्मा द्वारा किया गया वियोजन |

(ii) वैधुत वियोजन : वैधुत द्वारा प्रवाहित कर होने वाला वियोजन |

(iii) प्रकाशीय वियोजन : सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होने वाला वियोजन |
इस अभिक्रिया का उपयोग श्याम – शवेत फोटोग्राफी में होता है |

3.  विस्थापन अभिक्रिया: इन अभिक्रियाओं में अधिक क्रियाशील तत्व कम क्रियाशील तत्व को उसके योगिक से विस्थापित कर देता है |

4.  द्विविस्थापन अभिक्रिया: इस अभिक्रिया में उत्पादों का निर्माण, दो यौगिकों के बीच आयनो के आदान प्रदान से होता है |

5.  उपचयन तथा अपचयन :
अपचयन: (i) जब किसी पदार्थ में ऑक्सीजन का ह्वास होता है |

(ii) जब किसी पदार्थ में हाइड्रोजन की वृद्धि होती है |


रसायन विज्ञान

 रसायनशास्त्र, विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत पदार्थों के संघटन, संरचना, गुणों और रासायनिक प्रतिक्रिया के दौरान इनमें हुए परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है। इसका शाब्दिक विन्यास रस + आयन है जिसका शाब्दिक अर्थ रसों (द्रवों) का अध्ययन है। यह एक भौतिक विज्ञान है जिसमें पदार्थों के परमाणुओं, अणुओं, क्रिस्टलों (रवों) और रासायनिक प्रक्रिया के दौरान मुक्त हुए या प्रयुक्त हुए ऊर्जा का अध्ययन किया जाता है।

संक्षेप में रसायन विज्ञान रासायनिक पदार्थों का वैज्ञानिक अध्ययन है। पदार्थों का संघटन परमाणु या उप-परमाण्विक कणों जैसे इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से हुआ है।रसायन विज्ञान को केंद्रीय विज्ञान या आधारभूत विज्ञान भी कहा जाता है क्योंकि यह दूसरे विज्ञानों जैसे, खगोलविज्ञान, भौतिकी, पदार्थ विज्ञान, जीवविज्ञान और भूविज्ञान को जोड़ता है।